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Wednesday, October 29, 2008

'गांधी को सरकार के लोग ही मार डालते'

गांधीजी की प्रासंगिकता पर चिंतनपरक लेख लेखक और विचारक गिरिराज किशोर की कलम से बीबीसी से साभार.....गांधी पर बहसमुबाहिसा मं शामिल लोगों के लिए ख़ुराक
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मैंने बचपन में महात्मा गांधी को देखा था.
तब गांधीजी दिल्ली से हरिद्वार जा रहे थे. रास्ते में मेरा शहर मुज़फ़्फ़रनगर पड़ता है. हम सब बच्चे स्कूल से उन्हें देखने के लिए पहुँचे.

सुनकर आश्चर्य होगा कि गांधी से हमसे नहीं मिले. वे छिप गए. लेकिन जब लोगों ने घेर लिया तो बस से सिर निकालकर कहा, 'गांधी को भूल जाओ, अब तुम सब गांधी हो, जाओ देश को बनाओ.'

उनके स्वर में एक तरह की निराशा थी और यह निराशा धीरे-धीरे उपजी थी.

पहले गांधी जी कहा करते थे कि वे 125 बरस जीने वाले हैं. लेकिन विभाजन देखने के बाद, सरकार की बदलती हुई नीति देखने के बाद और जनता पर हो रहे दमन को देखने के बाद गांधी जी के मन में निराशा पैदा हो गई थी.

और तभी वह कहने लगे थे, "अब मेरे जीने का कोई लाभ नहीं. मैं चाहता हूँ कि जल्दी चला जाऊँ."

तो जो निराशा उनके मन में जीते-जी आ गई थी, अगर वह आज जीवित होते तो निराशा बढ़ती ही. गांधी तब एक निराश व्यक्ति थे और आज अगर वह होते तो भी सबसे दुखी प्राणी होते.

जिस तरह से समाज में अपराध बढ़ रहे हैं, बच्चों की हत्याएँ हो रही हैं, बलात्कार हो रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि गांधी आज होते तो वे इस समय की सरकारों के विरोध में भी सत्याग्रह कर रहे होते.

लगता है कि यदि आज गांधी होते तो सरकार के आदमी ही उन्हें मार डालते.

बदलाव

ऐसा नहीं है कि गांधी के दर्शन को हमने अब भुला दिया है. दरअसल इसकी शुरुआत तो गांधीजी के रहते-रहते ही हो चुकी थी.

आज़ादी मिलने के तुरंत बाद बीबीसी के एक संवाददाता से गांधी जी ने कहा था, "जाओ दुनिया से कह दो कि गांधी अब अंग्रेज़ी नहीं जानता."

जवाहर लाल नेहरू ने कहा तो था कि वे हिंदी को राजभाषा बनाएँगे, लेकिन वे मन ही मन अंग्रेज़ी को चाहते थे. जिस तरह से नेहरु ने पदवी देकर हिंदी को राजभाषा बनाया, उसने इसे साम्राज्यवाद का हिस्सा बना दिया.

दूसरा गांधीजी ने नेहरुजी से कहा था कि अब गाँवों की ओर देखिए, देश के आर्थिक आधार के लिए गाँवों को ही तैयार करना चाहिए.

उनका कहना था कि भारी कारखाने बनाने के साथ ही एक दूसरा स्तर बनाए रखना चाहिए जो गाँवों की अर्थव्यवस्था का था.

लकिन नेहरु जी ने उनसे कह दिया कि उनकी गाँवों में कोई ख़ास रुचि नहीं है. नेहरु जी की यह बात रिकॉर्ड में भी है.

अब जाकर मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि गाँवों की ओर ध्यान देना चाहिए.

हम जब छोटे थे तो पढ़ाई करते हुए श्रमदान करने जाते थे. सड़कें बनाने में और कुएँ खोदने में सहयोग दिया करते थे.

वह गांधी की शिक्षा का ही असर था कि जब तक बच्चे निर्माण कार्यों में योगदान नहीं करेंगे, वे अपने देश से नहीं जुड़ सकेंगे.

लेकिन धीरे-धीरे वह भी पाठ्यक्रम से हट गया. अब बच्चे रोज़गारोन्मुख शिक्षा देने लगे हैं.

गांधी जी दक्षिण अफ़्रीका में बैठे हुए भी भारत के बारे में सोच रहे थे.

'इंडियन ओपिनियन' की संपादकीय पढ़ें तो पता चलता है कि दक्षिण अफ़्रीका में हर क़दम उठाते हुए गांधी जी सोच रहे थे कि वे हिंदुस्तान की आज़ादी के लिए वह क्या-क्या करेंगे.

लेकिन हम भारत में रहकर यहाँ के लिए कुछ सोच नहीं पा रहे हैं. सच कहें तो अब भारत की सोच में गांधी अंश भर भी नहीं बचे हैं.

(विनोद वर्मा से हुई बातचीत के आधार पर)

बीबीसी से साभार प्रकाशित